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फर्जी जातीय प्रमाण पत्र पर MBBS में एडमिशन : RIMS पहुंची CID की टीम,खंगाल रही दस्तावेज

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रांची: राजधानी के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है. झारखंड CID की विशेष टीम बुधवार को रिम्स परिसर पहुंची है. जानकारी के अनुसार, CID की टीम एडमिशन से जुड़े गड़बड़ियों को लेकर जांच करने पहुंची है.यह कार्रवाई पिछले वर्ष में हुए एडमिशन से जुड़ी गंभीर गड़बड़ियों और शिकायतों को लेकर की जा रही है. डीन ऑफिस के रिकॉर्ड रूम में CID जांच पड़ताल कर रही है. अहम दस्तावेजों को खंगालने में जुटी हुई है.

फर्जी जाति प्रमाण पत्र पर एमबीबीएस में दाखिला लेने का मामला

राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) में फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर एमबीबीएस में दाखिला लेने का मामला सामने आया है. मामले की पुष्टि होने के बाद संस्थान ने प्रथम वर्ष की एमबीबीएस छात्रा काजल का दाखिला रद्द कर दिया है. रिम्स प्रशासन ने आंतरिक जांच के बाद पाया कि छात्रा ने अनुसूचित जाति (एससी) का फर्जी प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर आरक्षित सीट पर प्रवेश प्राप्त किया था.

20 नवंबर को निलंबन,1 दिसंबर को दाखिला समाप्त

रिम्स प्रशासन के अनुसार दस्तावेजों की नियमित जांच के दौरान अनियमितता सामने आई थी. इसके बाद छात्रा को 20 नवंबर 2025 को निलंबित कर दिया गया था. विस्तृत जांच पूरी होने के बाद 1 दिसंबर को उसका दाखिला औपचारिक रूप से रद्द कर दिया गया.

जांच के लिए रिम्स पहुंची CID टीम

मामले की गंभीरता को देखते हुए सीआईडी की टीम जांच में जुट गई है. मंगलवार को सीआईडी के अधिकारी रिम्स पहुंचे और निदेशक कार्यालय में संबंधित दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जांच की. अधिकारियों ने मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं की पड़ताल शुरू कर दी है. जांच का दायरा प्रवेश प्रक्रिया, प्रमाण पत्र सत्यापन और अन्य संभावित अनियमितताओं तक बढ़ाया जा सकता है.

MMCH में भी सामने आया समान मामला

रिम्स के अलावा डालटनगंज स्थित मेदिनीराय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (MMCH) में भी फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर दाखिला लेने का मामला सामने आया है. वहां प्रथम वर्ष के दो एमबीबीएस छात्रों का प्रवेश रद्द किया गया है. दोनों मामलों के सामने आने के बाद राज्य के मेडिकल कॉलेजों में दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

जाली प्रमाण पत्र से लिया गया प्रवेश माना जाता है अमान्य

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी फर्जी या जाली प्रमाण पत्र के आधार पर प्राप्त प्रवेश को कानून की नजर में "शून्य और अमान्य" माना जाता है। यानी ऐसा प्रवेश शुरुआत से ही वैध नहीं माना जाता. विशेषज्ञों के अनुसार उच्चतम न्यायालय भी कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि धोखाधड़ी के आधार पर प्राप्त किसी भी लाभ को बरकरार नहीं रखा जा सकता.

आरक्षित वर्ग के हक पर डाका

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई अभ्यर्थी किसी अन्य श्रेणी के दस्तावेजों का उपयोग कर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट पर प्रवेश प्राप्त करता है, तो वह वास्तविक पात्र उम्मीदवार के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है. ऐसे मामलों को गंभीर संवैधानिक और कानूनी उल्लंघन की श्रेणी में माना जाता है.

जांच रिपोर्ट के बाद हो सकती है आगे की कार्रवाई

सीआईडी की जांच के बाद मामले में आपराधिक मुकदमा दर्ज करने सहित अन्य कानूनी कार्रवाई की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है. फिलहाल जांच एजेंसियां दस्तावेजों की सत्यता और प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े सभी तथ्यों की जांच कर रही हैं.