BIHAR NEWS : आपराधिक मामले में संज्ञान लेने का आदेश न्यायिक विवेक का परिणाम होना चाहिए-पटना HC
Patna : पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक मामले में संज्ञान लेने का आदेश न्यायिक विवेक का परिणाम होना चाहिए. केवल छपे हुए प्रोफार्मा में रिक्त स्थान भरकर या बिना कारण दर्ज किए पारित संज्ञान आदेश कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरता.
इसी सिद्धांत को दोहराते हुए कोर्ट ने मधुबनी की विशेष अदालत द्वारा पारित संज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया और ट्रायल कोर्ट को कारणयुक्त नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया.
जस्टिस चंद्रशेखर झा की एकलपीठ ने अमरेंद्र कुमार उर्फ भोला प्रसाद यादव की याचिका स्वीकार करते हुए 19 सितंबर,2018 के उस आदेश को रद्द कर दिया,जिसके तहत फुलपरास थाना कांड संख्या-329/2016 में भारतीय दंड संहिता की धारा 323,504 तथा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(आर) एवं 3(2)(वीए) के तहत संज्ञान लिया गया था.
इस मामले के अनुसार,विद्यालय निधि में हुए खर्च का ब्यौरा मांगने पर एक वार्ड सदस्य के साथ जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर मारपीट करने और बाद में सूचना देने वाले व्यक्ति के साथ भी दुर्व्यवहार व मारपीट का आरोप लगाया गया था. इसी आधार पर प्राथमिकी दर्ज हुई थी.
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि संज्ञान का आदेश किसी स्वतंत्र न्यायिक विचार के बिना तैयार शुदा प्रोफार्मा पर पारित किया गया है,जिससे यह विधिसम्मत नहीं माना जा सकता.
हाईकोर्ट ने कहा कि संज्ञान लेते समय विस्तृत आदेश आवश्यक नहीं है,लेकिन आदेश से यह अवश्य स्पष्ट होना चाहिए कि न्यायालय ने उपलब्ध तथ्यों और लागू कानून पर विचार किया है.
कोर्ट ने पाया कि विवादित आदेश में किसी भी प्रकार के कारण दर्ज नहीं किए गए थे. इसलिए संज्ञान आदेश को निरस्त करते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि यदि मामला अब भी लंबित है तो कानून के अनुरूप कारणों सहित नया आदेश पारित किया जाए. याचिका इसी के साथ स्वीकार कर ली गई.
पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-





