धनबाद : आदिवासी समाज का प्राकृतिक पर्व 'बाहा' की धूम,आस्था और परंपरा का दिखा अनूठा संगम
धनबाद:जिले का पूर्वी टुंडी प्रखंड इन दिनों पारंपरिक मांदर की थाप और लोक गीतों से गूंज रहा है. आदिवासी समाज का सबसे पवित्र त्योहार 'बाहा पर्व' लोग धूमधाम से मना रहे हैं.प्रकृति से जुड़ाव और पूर्वजों की परंपरा को सहेजने वाला आदिवासी समाज आज अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है. पूर्वी टुंडी स्थित फतेहपुर में इन दिनों 'बाहा पर्व' की जबरदस्त रौनक देखने को मिल रही है. पेड़ों पर खिलते नए फूल और फागुन की इस बयार के साथ आदिवासी समाज के लोग प्रकृति की उपासना में डूबे हुए हैं.
तीन दिवसीय प्राकृतिक पूजन का आगाज
फतेहपुर में तीन दिवसीय इस प्राकृतिक पूजन का आगाज बेहद हर्षोल्लास के साथ हुआ है.बाहा, जिसका शाब्दिक अर्थ 'फूल' होता है, केवल एक त्योहार नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का एक माध्यम है. फागुन के महीने में जब प्रकृति पुराने पत्तों को त्याग कर नए फल-फूलों से लद जाती है, तो आदिवासी समाज इसे जीवन के नए चक्र के रूप में मनाता है.
बाहा पर्व भाईचारे और शुद्धता का प्रतीक
मान्यता है कि बाहा पर्व भाईचारे और शुद्धता का प्रतीक है. ग्रामीण एकजुट होकर जाहेर थान (पूजा स्थल) में पूजा-अर्चना करते हैं और खुशहाली की कामना करते हैं. इस दौरान पारंपरिक वेशभूषा में सजे युवा और बुजुर्गों का उत्साह देखते ही बनता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों की विरासत है, जिसे वे आने वाली पीढ़ी को सौंप रहे हैं. आदिवासी समाज की ओर सेमनाया जा रहा यह बाहा पर्व हमें संदेश देता है कि आधुनिकता की दौड़ में भी अपनी संस्कृति और प्रकृति को बचाए रखना कितना जरूरी है.





