Patna :पटना हाईकोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन और विभागीय नियमों की अनदेखी पर कड़ा रुख अपनाते हुए बिहार सरकार के लघु जल संसाधन विभाग के एक बड़े दंडात्मक आदेश को निरस्त कर दिया है. कोर्ट ने कार्यपालक अभियंता पवन कुमार को रिवर्ट कर सहायक अभियंता बनाने के आदेश और उसके बाद दायर समीक्षा याचिका रद्द करने के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया.

सिवान के नलकूप प्रमंडल में तैनात रहे कार्यपालक अभियंता पवन कुमार पर 13 नलकूपों के निर्माण में अनियमितता और कबाड़ सामग्री की नीलामी से जुड़े दो अलग-अलग आरोप लगाकर विभागीय कार्रवाई शुरू की गई थी. इसके आधार पर विभाग ने मई 2018 में उन्हें डिमोट कर मूल पद (सहायक अभियंता) पर भेज दिया था.

इस निर्णय के विरुद्ध उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. जस्टिस कुमार मनीष की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए विभागीय जांच की गंभीर प्रक्रियात्मक खामियों को उजागर किया.

विभागीय जांच में विभाग की ओर से एक भी गवाह पेश नहीं किया गया और न ही याचिकाकर्ता को किसी गवाह से जिरह का अवसर दिया गया.

विजिलेंस की क्लीन चिट को अनदेखा किया गया. जांच अधिकारी ने विजिलेंस डिपार्टमेंट के'टेक्निकल एग्जामिनर सेल'की उस रिपोर्ट को पूरी तरह दरकिनार कर दिया,जिसने अपनी जांच में स्पष्ट किया था कि कोई वित्तीय अनियमितता या अधिक भुगतान नहीं हुआ है.

दो अलग-अलग और असंबद्ध मामलों की जांच रिपोर्ट को बिना किसी वैधानिक आदेश के आपस में जोड़कर एक साथ संयुक्त सजा सुना दी गई,जो नियमों के खिलाफ है.

कोर्ट ने किसी को बिना सुने सजा न देना के सार्वभौमिक सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे विभागीय कार्यवाही में निष्पक्षता और न्याय के मूल सिद्धांतों का पालन करें. कोर्ट ने वर्षों पुराने इस मामले में दोबारा विभागीय जांच कराने से भी इनकार कर दिया.

हाईकोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय बाद प्रक्रिया को नए सिरे से शुरू करना याचिकाकर्ता के साथ अन्याय होगा. कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए निलंबन/अंतरिम अवधि के सेवा लाभों का निर्धारण कानून के अनुसार करन का निर्देश दिया है.

पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-