पटना : जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली जनहानि को कम करने के लिए वैज्ञानिक तकनीक, सटीक पूर्व चेतावनी और जन-जागरूकता को मजबूत करना जरूरी है. मौसम संबंधी चेतावनी तभी प्रभावी होगी, जब वह समय रहते समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और लोग उसके अनुरूप सुरक्षित व्यवहार अपनाएं. बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने ये बातें बुधवार को पटना के दशरथ मांझी श्रम एवं नियोजन संस्थान में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन क्लाइमेट चेंज क्रॉसरोड्स’ के उद्घाटन समारोह में कही.

जलवायु आपदाओं से निपटने में वैज्ञानिक तकनीक और जन-जागरूकता जरूरी - राज्यपाल

इस दो दिवसीय (30 सितंबर एवं 1 अक्टूबर) राष्ट्रीय सम्मेलन में पहले दिन जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों, चरम मौसमी घटनाओं, आपदा प्रबंधन, कृषि, जैव विविधता तथा मानव एवं पशु स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर देशभर से आए वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने मंथन किया.

जलवायु आपदाओं से निपटने में वैज्ञानिक तकनीक और जन-जागरूकता जरूरी - राज्यपाल

राज्यपाल ने कहा कि बिहार की भौगोलिक परिस्थितियां उसे बाढ़, वज्रपात और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाती हैं. नेपाल से आने वाली नदियां और गंगा के मैदानी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति राज्य के सामने अलग तरह की चुनौतियां खड़ी करती हैं. भौगोलिक परिस्थितियों को बदला नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली और जन-जागरूकता के माध्यम से आपदाओं के प्रभाव को काफी कम किया जा सकता है. उन्होंने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य के रूप में अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि मौसम पूर्वानुमान और चेतावनी तंत्र में हुई वैज्ञानिक प्रगति ने आपदा प्रबंधन को नई दिशा दी है.

जलवायु आपदाओं से निपटने में वैज्ञानिक तकनीक और जन-जागरूकता जरूरी - राज्यपाल

ग्लेशियर फेलियर को बताया भविष्य की बड़ी चुनौती

हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती आपदाओं का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने ग्लेशियर फेलियर को भविष्य की बड़ी चुनौती बताया. उन्होंने कहा कि हिमालयी आपदाओं की निगरानी के लिए पारंपरिक मौसम पूर्वानुमान के साथ उपग्रह आधारित तकनीक,अत्याधुनिक सेंसर और दूरसंवेदी तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना होगा. लद्दाख,हिमाचल प्रदेश से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक ग्लेशियरों की निगरानी और प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने के लिए मौसम विभाग,राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों को मिलकर काम करना होगा.

चेतावनी को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती

वज्रपात को बिहार सहित पूर्वी भारत के कई राज्यों के लिए गंभीर चुनौती बताया. उन्होंने कहा कि मौसम विभाग की ओर से अब काफी पहले बिजली गिरने की चेतावनी उपलब्ध कराई जा रही है,लेकिन इसे अंतिम व्यक्ति तक समय पर पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती है. ग्रामीण क्षेत्रों में किसान हमेशा मोबाइल फोन साथ नहीं रखते. ऐसे में मोबाइल संदेशों के साथ स्थानीय प्रशासन,सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली,लाउडस्पीकर और माइक्रोफोन के जरिए भी तत्काल चेतावनी प्रसारित करने की व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए. लोगों को मौसम संबंधी चेतावनियों को गंभीरता से लेने और उसके अनुरूप सुरक्षित व्यवहार अपनाने के लिए लगातार जागरूक करना भी जरूरी है.

अन्य वक्ताओं ने भी सामूहिक प्रयास पर दिया जोर

भारत मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में अत्यधिक बारिश जैसी चरम मौसमी घटनाएं बढ़ रही हैं. उन्होंने बताया कि‘मौसम मिशन’के तहत वर्ष 2030 तक पूर्वानुमान की सटीकता में 10-15 प्रतिशत सुधार का लक्ष्य है तथा देश में मौसम रडार और स्वचालित मौसम केंद्रों का विस्तार किया जा रहा है. बिहार में वज्रपात से हर वर्ष करीब 250 से 300 लोगों की मौत का उल्लेख करते हुए उन्होंने पूर्व चेतावनी तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत बताई.

केंद्रीय विश्वविद्यालय दक्षिण बिहार बोधगया के कुलपति डॉ. कामेश्वर नाथ सिंह ने जलवायु संकट से निपटने के लिए वैज्ञानिकों,शिक्षाविदों,नीति-निर्माताओं और समाज के सभी वर्गों के सामूहिक प्रयास पर जोर दिया. उन्होंने मिट्टी,आर्द्रभूमि और जैव विविधता के संरक्षण के साथ पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली अपनाने की आवश्यकता बताई. अन्य विशेषज्ञों ने भी कृषि,जैव विविधता,चरम मौसमी घटनाओं,मानव-पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ देखते हुए समाधानपरक शोध और नीतियों पर जोर दिया.

इस सम्मेलन में युवा वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों की भागीदारी को भी विशेष महत्व दिया गया. डीपीएस की कक्षा 12 के विद्यार्थियों न्यासा,पार्थ और शांभवी ने जलवायु अनुसंधान पर अपनी प्रस्तुति राज्यपाल और विशेषज्ञों के समक्ष दी. सम्मेलन की शोध-सार पुस्तिका का अनावरण राज्यपाल एवं अन्य अतिथियों ने किया.

सम्मेलन में प्रोफेसर एवं आईएमएस पटना चैप्टर के अध्यक्ष प्रधान पार्थ सारथी,मौसम विज्ञान केंद्र पटना के प्रमुख वैज्ञानिक आशीष कुमार सहित देशभर से आए वैज्ञानिक,शोधकर्ता और विशेषज्ञ शामिल हुए.