क्या NDA में सबकुछ ठीक नहीं? हार के बाद गठबंधन की अंदरूनी खींचतान आई सामने
तिरहुत स्नातक एमएलसी चुनाव में अभिषेक झा की हार अब सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं रह गई है, बल्कि इसने बिहार एनडीए के भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान को भी सार्वजनिक कर दिया है। चुनाव में बंशीधर ब्रजवासी की जीत के बाद जिस तरह गठबंधन के नेताओं के बयान सामने आ रहे हैं, उससे कई राजनीतिक सवाल खड़े हो रहे हैं।
सबसे पहले जेडीयू सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने कुछ गठबंधन नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने संकेत दिया कि कुछ लोगों ने व्यक्तिगत नाराजगी के कारण अभिषेक झा का साथ नहीं दिया। देवेश ठाकुर का यह बयान सीधे तौर पर एनडीए के भीतर कथित भीतरघात की ओर इशारा करता है।
हालांकि, बीजेपी विधायक बैद्यनाथ प्रसाद ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि एनडीए के सभी घटक दलों ने मिलकर चुनाव में काम किया। उन्होंने अभिषेक झा के वोटों में बढ़ोतरी को गठबंधन के सामूहिक प्रयास का प्रमाण बताया। यानी एक तरफ जेडीयू सांसद सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी तरफ बीजेपी विधायक गठबंधन की एकजुटता का दावा कर रहे हैं।
इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा अभिषेक झा के उस बयान की हो रही है, जिसमें उन्होंने खुद की तुलना महाभारत के अभिमन्यु से की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या वह अपने ही राजनीतिक परिवार यानी एनडीए के चक्रव्यूह में अकेले पड़ गए थे? साथ ही करीब 4700 मतपत्रों के अमान्य होने का दावा भी किया।
आखिर इस बयानबाजी के क्या हैं मायने?
राजनीतिक रूप से देखें तो इस बयानबाजी के तीन बड़े मायने निकलते हैं।
पहला, एनडीए के भीतर सहयोगी दलों के बीच आपसी विश्वास को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। दूसरा, चुनावी हार की जिम्मेदारी तय करने के बजाय अब गठबंधन के नेता एक-दूसरे की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। तीसरा, अभिषेक झा का अभिमन्यु वाला बयान भविष्य की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश हो सकता है।
हालांकि, अभी किसी भी नेता के आरोपों से भीतरघात साबित नहीं होता। लेकिन इतना जरूर है कि तिरहुत चुनाव ने एनडीए के अंदरूनी समीकरणों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल एक चुनाव की हार से उपजी नाराजगी है या बिहार एनडीए के भीतर भविष्य की राजनीतिक हिस्सेदारी और नेतृत्व को लेकर कोई बड़ी खींचतान चल रही है?
पटना से संजय कुमार की रिपोर्ट

