Patna : पटना हाईकोर्ट ने मुजफ्फरपुर जिले के सकरा थाना क्षेत्र में13साल पहले हुई एक शादी विवाद से उपजी झड़प और हत्या के मामले में बड़ा निर्णय सुनाया है. जस्टिस चंद्र शेखर झा की एकलपीठ ने निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए बुजुर्ग दंपति कर्पूरी ठाकुर और उनकी पत्नी बलकेसरी देवी को संदेह का लाभ देते हुए बाइज्जत बरी कर दिया है.

ये घटना16जुलाई,2013की रात करीब10:30बजे सकरा थाना क्षेत्र के सिमरी गांव की है.

कर्पूरी ठाकुर के बेटे के शादी के प्रस्ताव को लेकर सूचक (रंजीत कुमार ठाकुर) के साथ तीखी बहस हुई थी. ये आरोप लगाया गया था कि बहस के कुछ देर बाद कर्पूरी ठाकुर,बलकेसरी देवी और अन्य आरोपी लाठी-डंडे और लोहे की छड़ से लैस होकर आए और दिनेश ठाकुर पर जानलेवा हमला कर दिया.

इलाज के लिए अस्पताल ले जाते समय दिनेश ठाकुर ने दम तोड़ दिया था. निचली अदालत (अपर सत्र न्यायाधीश-III,मुजफ्फरपुर) ने31जनवरी,2017को दंपति को भारतीय दंड संहिता (IPC)की धारा304/34 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत4साल और धारा323/34 (मारपीट) के तहत6महीने की सजा सुनाई थी.

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों और गवाहियों का गहन पुनर्मूल्यांकन करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष अपना मामला'संदेह से परे'साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है. केस दर्ज कराने वाले मुख्य गवाह ने कोर्ट में बयान दिया कि उसने घटना स्थल पर मृतक को देखा ही नहीं था,बल्कि उसे अस्पताल में देखा.

उसने यह भी स्वीकार किया कि घटना की रात अंधेरा था और पुलिस बयान के समय उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी.

इस मामले के कुल11गवाहों में से अधिकांश कोर्ट में अपने शुरुआती बयानों से मुकर गए.

घटना के स्थान और समय को लेकर चश्मदीदों के बयानों में भारी भिन्नता पाई गई.

घटना के दौरान आरोपी पक्ष (कर्पूरी ठाकुर और बलकेसरी देवी) को भी गंभीर चोटें आई थी और उन्होंने भी काउंटर केस (सकरा थाना कांड संख्या352/2013)दर्ज कराया था. पुलिस और अभियोजन पक्ष ने आरोपियों की चोटों का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया.

घायल बताए गए गवाहों की कोई मेडिकल इंजरी रिपोर्ट अदालत के सामने पेश नहीं की गई. रात का अंधेरा होने के कारण हमलावरों की पहचान और विशिष्ट भूमिका संदिग्ध पाई गई,साथ ही कथित हथियारों (लाठी,रॉड,खांती) की कोई बरामदगी नहीं हुई थी.

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों (लक्ष्मी सिंह बनाम बिहार राज्य,आनंद रामचंद्र चौगुले एवं परशुराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य) का हवाला देते हुए टिप्पणी की:

"कानून में केवल किसी की मृत्यु हो जाना ही आरोपी को दोषी ठहराने का आधार नहीं बन सकता. संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो,वह कानूनी सबूत का स्थान नहीं ले सकता. अभियोजन को अपना मामला अपने पैरों पर खड़ा करना होता है,न कि बचाव पक्ष की कमजोरियों का फायदा उठाकर."

पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-