पटना: भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पटना स्थित बिहार राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण में देश के पहले पीड़ित अधिकार केंद्र का उद्घाटन किया. इस अवसर पर एक'ट्रांसजेंडर हेल्पलाइन'का शुभारंभ किया गया.
इस अवसर पर भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि पीड़ित अधिकार केंद्र का काफी बड़ा महत्व है. आम पीड़ितों तक न्याय पहुँचाने का दायित्व इस पीड़ित अधिकार केंद्र का है. उन्होंने कहा कि न्याय सार्थक तभी होगा, जब वह उस व्यक्ति तक पहुंच पाये,जिन्हें न्याय की सबसे अधिक आवश्यकता है.
उन्होंने कहा कि पीड़ित अधिकार केंद्र को उन पीड़ित नागरिकों तक पहुंचना होगा,जो स्वयं न्यायिक प्रक्रिया तक नहीं पहुँच सकते,जिनके पास संसाधन व जानकारी का अभाव हो. आम पीड़ितों के अलावे महिला,बच्चे,ट्रांसजेंडर,वरीय नागरिक की समस्यायें पर भी प्राथमिकता देनी होगी.
उन्होंने कहा कि ऐसे लोग जो खुद न्यायिक व्यवस्था को नहीं जानते,समझते हैं,उन तक न्याय व्यवस्था का खुद पहुंचना संवैधानिक दायित्व है. उनके लिए कानूनी सहायता,सलाह,चिकित्सीय सहायता,पुनर्वास,क्षतिपूर्ति व अन्य समस्यायों का समाधान पीड़ित अधिकार केंद्र तहत दिया जाना सकारात्मक कदम है.
बालसा के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस सुधीर सिंह ने सभी गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया. अपने स्वागत भाषण में उन्होंने कहा कि न्याय तभी सफल और सार्थक होगा,जब वह उन पीड़ितों तक पहुंचेगा,जिन्हें उसकी सबसे अधिक जरूरत है. उन्होंने बताया कि नौ वाहन राज्य के विभिन्न जगहों में रवाना हुए है,जो न्यायिक सहायता प्रदान करने के न्याय के सम्बन्ध में जागरूकता फैलायेंगे.
मल्टी-यूटिलिटी वाहनों के बेड़े को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया और चीफ जस्टिस केंद्र पर प्राधिकरण के आधिकारिक प्रकाशन का विमोचन किया. यह केंद्र देश में अपनी तरह का पहला केंद्र है.
पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस वी कामेश्वर राव ने अपने सम्बोधन में इस पीड़ित अधिकार केंद्र की महत्ता और उपयोगिता पर प्रकाश डाला. पीड़ितों तक न्याय का पहुँचना बहुत आवश्यक है. ऐसा नहीं होने पर जानकारी,संसाधन के अभाव में वे न्याय से वंचित रह जायेंगे.
यह बिहार राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण की एक पायलट परियोजना है,जिसे कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987की धारा12के तहत स्थापित किया गया है. अपराध से पीड़ित व्यक्ति या उसका परिवार शायद ही कभी न्याय प्रणाली का सामना करने के लिए पहले से तैयार होता है.
इस स्थिति में पीड़ित परिवार को पुलिस स्टेशन,अस्पताल,अदालत और कई सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं. यद्यपि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023और बिहार पीड़ित मुआवजा योजना, 2014के तहत मुफ्त आपातकालीन चिकित्सा,मुफ्त कानूनी सहायता,एफआईआर की प्रति,जमानत के चरण में सुनवाई,मुआवजा,सुरक्षा और अपील का अधिकार जैसे कई अधिकार पहले से प्राप्त हैं,लेकिन अब तक कोई ऐसी संस्था नहीं थी,जो पूरी प्रक्रिया के दौरान पीड़ित के साथ खड़ी रहे.
वर्तमान में सहायता विभिन्न संस्थाओं (जैसे जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण,पुलिस,वन स्टॉप सेंटर,समाज कल्याण विभाग,अस्पताल आदि) में बिखरी हुई थी. यह केंद्र उन सभी कमियों को दूर करने के लिए निम्न सुविधाएं प्रदान करेगा.
एक एकल प्रवेश द्वार होगा. पीड़ित को अलग-अलग काउंटरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे.
एकल रिकॉर्ड होगा,जिससे पीड़ित को हर जगह अपनी आपबीती दोहराने की आवश्यकता नहीं होगी.
साथ ही केंद्र के लिए आंतरिक समय-सीमा तय की गई है और राहत मिलने व सत्यापन होने के बाद ही मामला बंद किया जाएगा.
यह केंद्र किसी नए कानून या नए वैधानिक निकाय के बिना,प्राधिकरण के मौजूदा परिसरों और संसाधनों का उपयोग करके काम करेगा. इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय,निरंतरता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है.
इस परियोजना की परिकल्पना और कार्यान्वयन पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस व प्राधिकरण के मुख्य संरक्षक जस्टिस वी. कामेश्वर राव तथा पटना हाईकोर्ट व प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस सुधीर सिंह के मार्गदर्शन में किया गया है.
पटना हाईकोर्ट के जस्टिस अजीत कुमार इसके पहले अध्यक्ष हैं.
समन्वय समिति विभिन्न संबंधित विभागों के प्रतिनिधि इसमें शामिल हैं.
इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट सेक्रेटरी जनरल,पटना हाईकोर्ट के जज,विधि सचिव बलराम दुबे,अधिवक्तागण व बड़ी संख्या में अधिकारी उपस्थित थे. बालसा के सदस्य सचिव पुरूषोत्तम मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापन किया.
प्राधिकरण के सदस्य सचिव के पास इसका प्रशासनिक नियंत्रण रहेगा. यह केंद्र देश में पहली बार'स्थितिजन्य पीड़ितों' को एक विशिष्ट वर्ग के रूप में मान्यता देता है और उनका रिकॉर्ड रखता है.
जब परिवार का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति लंबे समय तक विचाराधीन कैदी रहता है,तो परिवार की आय बंद हो जाती है और बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं.
लंबी हिरासत के बाद बरी होकर लौटने वाले व्यक्ति जिनका आजीविका और सामाजिक जीवन समाप्त हो चुका होता है.
बिहार में31दिसंबर, 2023तक जेलों में53,076बंदी थे (देश में दूसरा सबसे अधिक),जिनमें से46,000से अधिक विचाराधीन कैदी थे. यह केंद्र पहले तीन महीनों में पटना के लिए बेसलाइन डेटा संकलित करेगा.
भारत के चीफ जस्टिस का पीड़ित अधिकारों के प्रति योगदान पूर्व में भी महत्वपूर्ण रहा है. जगजीत सिंह बनाम आशीष मिश्रा मामले में उन्होंने फैसला दिया था कि पीड़ित को सुने जाने का अधिकार आपराधिक प्रक्रिया के हर चरण (जांच से लेकर जमानत और अपील तक) में शामिल है.
इस अवसर पर केंद्र की मानक संचालन प्रक्रिया और योजनाओं पर आधारित एक पुस्तिका का विमोचन किया जाएगा,जिसे अधिवक्ता और परियोजना समन्वयक शमा सिन्हा द्वारा तैयार किया गया है.
पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-

