राष्ट्रीय नेताओं की खामोशी पर सवाल,नहीं व्यक्त की गई संवेदना
रांची/गिरिडीह: झारखंड मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ और सक्रिय नेता और राज्य सरकार में मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के असामयिक निधन से झारखंड की राजनीति और सामाजिक जगत में शोक की लहर है। उनके निधन की खबर सामने आते ही राजनीतिक दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं, समर्थकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से श्रद्धांजलि देने का सिलसिला शुरू हो गया। सोशल मीडिया पर भी सुदिव्य कुमार सोनू को याद करते हुए बड़ी संख्या में शोक संदेश सामने आए। उनके साथ राजनीतिक और व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए लोगों ने उनके योगदान और सक्रिय राजनीतिक भूमिका को याद किया।राज्य में शोक,राष्ट्रीय स्तर पर चुप्पी की चर्चासुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद जहां झारखंड के अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं ने शोक जताया,वहीं राष्ट्रीय स्तर के कुछ प्रमुख नेताओं की ओर से सार्वजनिक श्रद्धांजलि संदेश सामने नहीं आने को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी,कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव जैसे बड़े नेताओं की ओर से सार्वजनिक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं दिखने की बात चर्चा में है। हालांकि,सोशल मीडिया पर किसी नेता की ओर से पोस्ट नहीं किया जाना उनकी व्यक्तिगत संवेदना या प्रतिक्रिया का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद झारखंड सरकार के एक मंत्री और सक्रिय राजनीतिक चेहरे के निधन के बाद राष्ट्रीय स्तर पर कुछ बड़े नेताओं की सार्वजनिक चुप्पी चर्चा का विषय जरूर बन गई है।निशिकांत दुबे की चुप्पी पर भी सवालइसी बीच गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे का नाम भी इस चर्चा में सामने आया है। गिरिडीह, देवघर और गोड्डा झारखंड के संथाल परगना और आसपास के राजनीतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे में सुदिव्य कुमार सोनू के निधन पर निशिकांत दुबे की ओर से सार्वजनिक श्रद्धांजलि संदेश नहीं आने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, किसी नेता की ओर से सार्वजनिक बयान नहीं दिए जाने के पीछे कई व्यक्तिगत या राजनीतिक कारण हो सकते हैं। ऐसे में इसे सीधे तौर पर संवेदनहीनता से जोड़ना उचित नहीं होगा।क्या राजनीतिक मतभेदों से ऊपर होती हैं संवेदनाएं?सुदिव्य कुमार सोनू का निधन झामुमो और झारखंड सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान है। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम ने एक व्यापक सवाल भी खड़ा किया है—क्या किसी जनप्रतिनिधि के निधन पर राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर संवेदना व्यक्त की जानी चाहिए? क्या राजनीतिक विरोध अपनी जगह और मानवीय संवेदनाएं अपनी जगह होनी चाहिए? सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद झारखंड में उमड़ी श्रद्धांजलियों के बीच राष्ट्रीय राजनीति के कुछ बड़े चेहरों की सार्वजनिक चुप्पी ने इन सवालों को और चर्चा में ला दिया है। अब नजर इस बात पर है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं।झारखंड में इंडिया गठबंधन की सरकारयह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन की सरकार का हिस्सा हैं। ऐसे में राज्य सरकार के एक मंत्री और गठबंधन के प्रमुख घटक दल के सक्रिय नेता सुदिव्य कुमार सोनू के असामयिक निधन पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से सार्वजनिक रूप से शोक संदेश सामने नहीं आने को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन गठबंधन की राजनीति के बीच एक साथी दल के वरिष्ठ नेता और राज्य सरकार के मंत्री के निधन पर राष्ट्रीय नेतृत्व की प्रतिक्रिया को लेकर लोगों की निगाहें स्वाभाविक रूप से टिकी रहती हैं।रांची से संवाददाता राहुल कुमार की रिपोर्ट
archana singh·