धनबाद : अगर मजदूरों का शोषण देखना है, तो एक बार पूर्व मध्य रेलवे के धनबाद जंक्शन पहुंच कर वहां कार्य कर रहे हैं आउटसोर्सिंग कंपनी के सफाई कर्मियों को अवश्य देखें। जो दिन रात एक कर धनबाद रेलवे स्टेशन को सफाई के लिए देश में अव्वल रखने के लिए बारिश व कड़ी धूप की परवाह तक नहीं करते। वैसे सफाई कर्मियों के हिस्से की मेहनत की कमाई को रेल के वरीय अधिकारी और आउटसोर्सिंग कंपनी के जिम्मेवार बंदरबांट करने से भी गुरेज नहीं करते। कहने को तो कई नेता और संस्था इन मजदूरों को न्याय और हक दिलाने की बात करते हर चौक चौराहे पर मिलेंगे। परंतु इन्हें अब तक कोई भी शोषण की बेड़ी से आजादी नहीं दिला सका। क्योंकि जो भी आया, मीठी मीठी मीठी बातें कर इन्हें लूट कर चलते बना।
सफाई कर्मियों से बात करने पर पता चला कि उन्हें मात्र ₹206 प्रतिदिन की दर से भुगतान किया जा रहा है। जबकि रेलवे के कागजों में भुगतान की राशि ₹726 प्रतिदिन है। लगातार कई वर्षों से काम करने वाले सफाई कर्मियों ने बताया कि उन्हें प्रोविडेंट फंड से संबंधित कोई भी कागजात नहीं मिला है। वही इनके मजदूरी की भुगतान नगद रकम से की जाती है।
जबकि सफाई का काम देखने वाली कंपनी के सुपरवाइजर रोशन का कहना है सफाई कर्मियों को रेलवे के नियम व एग्रीमेंट के तहत मजदूरी भुगतान किया जा रहा है। इनका प्रोविडेंट फंड से संबंधित रकम की भी नियम पूर्वक कटौती हो रही है।
पूर्व मध्य रेलवे हाजीपुर ने धनबाद रेल मंडल के धनबाद रेलवे जंक्शन की सात प्लेटफार्म तथा स्टेशन परिसर की सफाई के लिए एक निजी कंपनी को जिम्मा सौंपा। जिसके अंतर्गत प्रत्येक सफाई कर्मियों को न्यूनतम मजदूरी, वर्दी, प्रोविडेंट फंड जैसी सुविधाएं मुहैया कराना आवश्यक रखा गया है। परंतु रेलवे के वरीय अधिकारियों तथा आउटसोर्सिंग कंपनी के जिम्मेवारों की मिलीभगत से धनबाद जंक्शन पर कार्य करने वाले सफाई कर्मियों का शोषण और आर्थिक दोहन बदस्तूर जारी है। इस पर लगाम लगाने की हिम्मत किसी की नहीं हुई। समय-समय पर रेलवे के वरीय अधिकारी भी लंबी चौड़ी बातें अवश्य करते हैं, वही मजदूर नेता भी उनका हक दिलाने का दावा करते हैं। परंतु वर्षों गुजर गए, इन सफाई कर्मियों की किस्मत नहीं बदली।
केंद्र सरकार ने पारदर्शिता कायम करने के लिए सफाई कर्मियों के बैंक खाते में वेतन और अन्य मद से मिलने वाली राशि का भुगतान करने का समझौता आउटसोर्सिंग कंपनियों के मालिकों कर रखा है। लेकिन इनकी तकदीर में शोषण लिखा था और आज भी शोषण लिखा जा रहा है।
आखिर इन सफाई कर्मियों की फरियाद को कौन सुनेगा? क्योंकि 'जब सैंया भए कोतवाल, तो डर काहे का' वाली कहावत चरितार्थ होली दिख रही है। ऐसे में रेलवे अधिकारी इन मजदूरों के शोषण का एक बड़ा हिस्सा प्रतिमाह लेकर मलाई खाने में मशगूल हैं। वही आउटसोर्सिंग कंपनी के जिम्मेवार इन कम पढ़े लिखे हुए सफाई कर्मियों का आर्थिक दोहन कर मजे उड़ा रहे हैं।
इस बाबत मीडिया की टीम ने गोपनीयता बरतते हुए गुप्त ढंग से जब इन सफाई कर्मियों से बात की, तो पूरे मामले का खुलासा हुआ। स्थिति इतनी बदतर है कि सफाई कर्मी लोग अपने हक के लिए खुलकर बोल भी नहीं सकते। क्योंकि इन्हें पता है कि कंपनी के जिम्मेवार को मालूम होते ही इन्हें दूध में गिरे मक्खी के भांति निकाल कर फेंक दिया जाएगा और इनकी रोजी-रोटी पर आफत की पहाड़ टूट पड़ेगी।
रिपोर्ट:- कन्हैया

