ब्रेकिंग न्यूज़  
  • CNT एक्ट पर अर्जुन मुंडा की सरकार को चेतावनी

    चाईबासा ।  हाल ही में झाऱखंड जनजातीय विकास परिषद की एक बैठक हुई और उस बैठक में कई मुद्दों पर चर्चा की गयी। इसमें थाने की बाध्यता को खत्म करने और आदिवासियों को जमीन पर लोन दिलाना चर्चा के मुख्य बिंदु रहे। दरअसल CNT एक्ट के तहत फिलहाल सरकार की ओर से ये बाध्यता है कि कोई भी आदिवासी अपने थाना क्षेत्र के अलावा दूसरे थाना क्षेत्र के आदिवासियों को जमीन नहीं बेच सकता है । इसके साथ ही आदिवासियों को उनकी जमीन पर लोन नहीं देने का भी प्रावधान है । इसमें बदलाव करने की मांग पर लोन देने के क्रम में सरकार को पक्ष बनाने की बात पर चर्चा हुई।  जनजातीय विकास परिषद की बैठक पर पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा ने अपने विचार व्यक्त किए और साथ ही रघुवर सरकार को चेतावनी भी दी है। ।

    अर्जुन मुंडा ने साफतौर पर कहा कि राज्य के कई हिस्सों में कानून के माध्यम से ट्राइबल लैंड प्रोटेक्ट किया जाता है । इस तरह की बातें कही जी रही हैं कि बैंकों से ऋण प्राप्त करने के लिए मोर्गेज कर सकते हैं। ये विषय मेरे हिसाब से आत्मघाती होगा। आज CNT  एक्ट पर बात हो रही है, कल बिल्किंसंस रूल्स के आधार पर जो गवर्नेंस है, उस पर सवाल खड़े करने की कोशिश होगी और उस पर भी छेड़छाड़  की बात होगी। मुझे लगता है कि इन सारे मामलों पर सरकार को निश्चित रूप से सतर्क रहना चाहिए। 

  • नौकरी और पत्नी के विवाद में एक सनकी ने ली 5 की जान, बोटियों संग खुद को भी मारी गोली

    मुजफ्फरपुर । जिले के सरैया ब्लॉक के बनिया गांव में गुरूवार को एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया कि देखने वालों के दिल दहल उठे। बनिया गांव में एक सनकी किस्म के आदमी ने 5 लोगों को मौत के घाट उतार दिया और साथ ही खुद की भी जीवनलीला समाप्त कर ली। दरअसल पड़ोसी द्वारा पत्नी को गायब करने के शक में सत्येंद्र सिंह उर्फ डोनाल्डने गुरुवार दोपहर अपनी दो बेटियों समेत पांच लोगों की हत्या कर दी । घटनास्थल पर मुजफ्फरपुर – वैशाली सीमा की सभी थानों की पुलिस पहुंची और जांच शुरू कर दी है। वहीं फौरेंसिक टीम भी मौके पर पहुंचकर साक्ष्यों को जुटाना शुरू कर दिया है। मौके से 21 राउंड गोली और कई खोखे भी बरामद किये गए हैं।  

    इस पूरी घटना के पीछे सालों पुरानी दुश्मनी को बताया जा रहा है। सत्येंद्र उर्फ डोनाल्ड का अपने ही पड़ोसी रामबाबू से दुश्मनी की बात सामने आयी है। दरअसल सत्येंद्र पहले जिस जमींदार के यहां काम करता था तो किन्हीं कारणों से उस जमींदार ने उसे नौकरी निकाल दिया और उसकी जगह रामबाबू को रख लिया। बस उसके बाद से ही सत्य़ेंद्र की दुश्मनी शुरू हो गयी। नौकरी से निकालने जाने की वजह वो रामबाबू और उसके पिता को मानता था। अपनी इसी दुश्मनी की आग में जल रहा सत्येंद्र  गुरूवार की दोपहर रामबीबू के घर पहुंचा ताकि वो उसके खानदान को खत्म कर सकते । लेकिन घर में रामबाबू को ना पाकर उसने उसके मां- बाप और नौकर को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद वो अपने घर आया और अपनी 8 और 10 साल की दो बेटियों को भी गोली मार कर खुद को भी गोली मारकर जीवनलीला समाप्त कर ली। सत्येंद्र को सभी सनकी किस्म का बताते हैं। वहीं माना तो ये भी जा रहा है कि सत्येंद्र की पत्नी उसे छोड़कर कहीं चली गयी है और उसके पीछे की वजह भी वो रामबाबू को ही मानता था।

    वहीं इस पूरे मामले पर मुजफ्फरपुर के SSP रंजीत मिश्रा ने बताया कि इस घटना के पीछे प्रथम दृष्टया जो वजह खुलकर सामने आयी है , उसके मुताबिक सत्येंद्र की नौकरी जाना और उसके जगह पर रामबाबू को नौकरी मिलना ही है। घटना स्थल से एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ है, जिसमें इसी बात का जिक्र किया गया है। दुश्मनी की वजह से ही उसने रामबाबू के माता – पिता की जान ली । फिलहाल मामले की तफ्तीश की जा रही है। 

  • मुलायम को मनाने की समधि विधि हो पायेगी कामयाब !

    पटना। महागठबंधन की एक कड़ी गुरूवार को टूट कर अलग हो गय़ी। इस गठबंधन की नींव रखने वाले सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की पार्टी ने ये एलान कर दिया कि अब बिहार विधानसभा चुनाव में सपा अकेले चुनाव लड़ेगी । इस महाटूट के बाद अब महागठबंधन खेमे में कोहराम मचा हुआ है। सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव को मनाने का सिलसिला कल देर तक चला। जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने कल देर रात मुलायम सिंह से मुलाकात की । मुलाकात के बाद शरद यादव ने मीडिया से भी बात की और कहा कि हम उन्हें मना लेंगे और हमारा गठबंधन जारी रहेगा। लेकिन अटकलें तो ये भी लगायी जा रही हैं कि मुलायम को मनाने में शरद नाकाम रहे हैं।

    लेकिन महागठबंधन ने भी अपनी कोशिश जारी रखी है। अब इन दूरियों को मिटाने के लिए समधियाने का रिश्ता बीच में लाया जा रहा है। सपा सुप्रीमो की नाराजगी दूर करने राजद सुप्रीमो लालू यादव दोपहर बाद दिल्ली रवाना होंगे । हो सकता है कि मुलायम अपने समधी की बात मान लें और महागठबंधन में वापसी कर लें। हालांकि ये सभी अटकलें ही हैं क्योंकि सपा की ओर से अलग होने का फैसला पार्टी की पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक में लिय़ा गया है। चूंकि गुरूवार को सपा की ओर से किए गए प्रेस कांफ्रेंस में ये भी स्पष्ट कर दिया गया कि बिहार चुनाव में महागठबंधन की से  दी गयीं 5 सीटें ना तो पार्टी नेतृत्व को और ना ही कार्यकर्ताओं को ही भा रही हैं। इससे भी ज्यादा कल ही सपा ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि अब उसकी किसी और पार्टी से बात चीत चल रही है और जल्दी ही उसका एलान भी कर दिया जाएगा। इस हिसाब से यदि इस पूरे मामले पर नजर दौड़ायी जाये तो सपा के महागठबंधन में वापस लौटने की उम्मीद कम ही है।

    यहां आपको बता दें कि हाल ही में महागठबंधन की ओर से साझा प्रेस कांफ्रेंस करके सीट बंटवारे पर स्थिती स्पष्ट किया गया था। बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से RJD और JDU को 100 – 100 और कांग्रेस को 40 सीटें महागठबंधन की ओर से दिया गया। जबकि बाकि बची 3 सीटें के अलावा लालू ने अपने खाते से 2 सीटें सपा को दीं। इस हिसाब से कुल 5 सीटें सपा को महागठबंधन ने दी। जो सपा को मंजूर नहीं हुई और सपा ने उसे अपना अपमान कह दिया।            

  • महागठबंधन से रिश्ता तोड़कर मुलायम ने लिया लालू से बदला - चिराग

     पटना। लोकजनशक्ति पार्टी के युवा नेता और रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने महागठबंधन की टूट पर तंज कसते हुए टिप्पणी की है। चिराह ने कहा कि ये तो तय ही था  और इसमें कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं है। सपा बिहार में अपनी हार के साथ यूपी इलेक्शन में नहीं जाना चाहती है। यही वजह है कि मुलायम सिंह ने महागठबंधन से अपने हाथ खींच लिये और एक तरह से बदला भी ले लिया है।क्योंकि जिस तरह से 90 के दशक के आखिरी दौर में लालू यादव ने मुलायम सिंह को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था तो इन्होंने  भी लालू यादव को नीतीश कुमार के साथ फंसाकर इनका गठजोड़ कराया और खुद इस महागठबंधन से अलग हो गये। जो महागठबंधन के सूत्रधार थे ,वो ही इससे अलग हो गये। ये एक ऐसी माला है , जिसमें मोती तो हैं , लेकिन कोई डोर नहीं है और जब डोर ही नहीं है तो ऐसे में इसके मोती बिखरेंगे ही।

    यहां बता दें कि लालू यादव और रामविलास पासवान के बीच मौखिक रूप से वार अक्सर चलता रहता है और लालू के बयान पर चिराग भी चुटकी लेते रहते हैं। लेकिन अब   जब  चुनाव सिर पर है तो ऐसे में बयानबाजी होना लाजिमी ही है।        

  • मोदी पर मुलायम हुए नेताजी

    कल्पना एक महाविलय की और तत्काल व्यवस्था गठबंधन की, और फिर अभिभावक मुलायम सिंह आखिरकार कठोरता से अलग भी हो गए। अलग ही नहीं हो गए, अलग से मोर्चाबंदी भी शुरू कर दी। समाजवादी पार्टी बिहार में महागठबंधन से अलग होकर और जरूरत पड़ी तो तीसरा मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ेगी।

    क्या ये बताने की जरूरत है कि किसको फायदा होगा और किसको नुकसान। मगर यहां नफा नुकसान वोटों का मत जोड़िए। यहां संदेशों की राजनीति है। ये झटका धरातल पर उतना बड़ा नहीं है जितना कि दिख रहा है। 

    समाजवादी पार्टी का बिहार में ट्रैक रेकार्ड बहुत अच्छा नहीं रहा। 2000 में संयुक्त बिहार चुनाव में पार्टी ने 122 सीटों पर उम्मीदवार उतारे,118 पर जमानत भी नहीं बचा पाई। वोट मिले 1 प्रतिशत से कुछ ज्यादा,  मगर खाता नहीं खुला।

    2005 की फरवरी में हुए चुनाव में 142 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 131 पर जमानत गंवाई। वोट मिले ढाई फीसदी के लगभग। सिकटा, फुलपरास, कसबा और डुमराव की चार सीटें जीत गए।

    राष्ट्रपति शासन में अक्टूबर 2005 में दोबारा चुनाव हुए तो पार्टी ने 158 प्रत्याशी उतारे, जिनमें से 150 की जमानत जब्त हो गई। वोट मिले ढाई प्रतिशत और सीटें मिली दो - फुलपरास और ठाकुरगंज।

    2010 के चुनाव में पार्टी ने 146 उम्मीदवार उतारे थे और एक भी सीट पर जमानत नहीं बचा पाई। एक फीसदी वोट भी नहीं मिले।  

    यानि बिहार में मुलायम सिंह के साथ होने का सिर्फ और सिर्फ एक मतलब था, मोदी के खिलाफ एकजुटता। महागठबंधन के सीट बंटवारे से नाराज समाजवादी पार्टी के बिहार अध्यक्ष ने मुलायम सिंह को सत्ताइस सीटों की सूची सौंपी थी। लालू और नीतीश चाहते तो थोड़ा-बहुत एजस्ट करके उन्हें टिका सकते थे, लेकिन मुलायम सिंह को फोर ग्रान्टेड लिया गया और नेताजी शायद यही चाहते भी थे।

    मुलायम सिंह यादव यानि नेताजी पर नजर रखने वाले जानते हैं कि वो भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे चतुर खिलाड़ियों में से एक हैं और नेताजी जानते हैं कि उन्हें अपने पत्ते कब तक फेंटते रहना है और कब कहां फेंकना है।  लोकसभा चुनाव के बाद देश की बदली राजनीतिक परिस्थितियों में नेता जी जो पत्ते फेंक रहे हैं वो 2017 के यूपी चुनाव में खुलकर सामने आएंगे।

    सीधे तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि नेताजी भी सीधे तौर पर कुछ नहीं कहते। लेकिन नेताजी मानते हैं कि अगर आप राजनीति में हैं और आपके हाथ में सत्ता की ताकत नहीं हैं तो ये एक तरह से वक्त की बर्बादी है। 

    केन्द्र सरकार के तोते (सीबीआई) से .यूपी के राजनेताओं का खौफ भला कौन नहीं जानता और यूपी में अखिलेश की सरकार ने ऐसा कोई काम नहीं किया है जिससे 2017 के चुनाव में वापसी की उम्मीद बंधे। मुसलमानों में रोष है कि वादा तो किया मगर न तो नौजवानों को नौकरी मिली और ना ही जेलों में बंद बेगुनाहों को कोई राहत। .कानून व्यवस्था, साम्प्रदायिक दंगों और अधूरे वादों पर अखिलेश सरकार चारों तरफ से घिरती रही। मगर मई के महीने में मथुरा में प्रधानमंत्री की रैली हुई, .भाषण हुआ और मुलायम सिंह यादव या यूपी की सरकार की कोई चर्चा तक नहीं हुई। मुलायम सिंह के पोते की शादी में दो-दो बार प्रधानमंत्री मोदी आए। क्या बिहार में महागठबंधन को झटका देने का सीधा मतलब नरेन्द्र मोदी को फायदा पहुंचाना नहीं है।क्या केन्द्र की बीजेपी सरकार राज्यसभा में समाजवादी पार्टी की पंद्रह सीटों की अहमियत नहीं समझती।


 
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